जेल जीवन का एक रंग यह भी | विश्वविजय

फरवरी का महीना था। कड़ाके की ठण्ड धीरे -धीरे विदा हो रही थी। सूरज का तेज कोहरे के कोप पर भारी पड़ता जा रहा था। अब पूरे दिन कोहरे में नहीं ढका रहता था सूरज। सुबह के 9-10 बजते-बजते निकल ही आता था।

उस दिन भी सूरज निकल आया था। लेकिन ट्रेन कोहरे के कारण थोड़ी विलम्ब से चल रही थी। मैं सीमा को लेने स्टेशन पर गया था और वहीं से एसटीएफ़ की गिरफ़्त में आ गया। फिर माओवादी होने के आरोप में जेल चला गया। ख़ास यह कि मैं और सीमा साथ – साथ नैनी जेल इलाहाबाद में 7 फरवरी 2010 को कैद किये गए।

वैसे तो अपने जेल जीवन के अनुभवों को हम दोनों ने अपनी जेल डायरी ‘ज़िंदांनामा’ में बयां किया है। लेकिन जेल जीवन को दर्ज करते हुए कई पहलू हमसे छूट गए है, या यह कहें कि हमने छोड़ दिया।

हमनवां सीमा और मैं जेल के सफ़र में भी हमसफ़र रहे। साथ-साथ गिरफ्तार हुए और जेल गए। जिंदगी के सफ़र में गुज़रे इस मुक़ाम का एक पहलू यह रहा कि हम दोनों ने एक दूसरे को अपने मनोभावों से लबरेज अनेक चिट्ठियाँ लिखी। दुःख-सुख प्यार-मुहब्बत अफ़सोस कि उन चिठ्ठियों को हम सहेज नहीं पाए। तलाशी में छीन लिए जाने के डर से पढ़कर फाड़ते रहे। यदि उन चिठ्ठियों को हम सहेज पाते तो यक़ीनन एक मुकम्मिल किताब की शक्ल अख्तियार करती। फिर भी जेल की जालिम नज़र से हम कुछ कार्ड बचा लाये जो आज भी हमारे पास है। जिसके सहारे हम दोनों जेल के उदास मौसम में भी गुलमोहर-अमलतास की तरह टहक गुलजार बने रहे।

हमारी गिरफ्तारी का दिन शनिवार था। तब तक मुझे मालूम नहीं था, कि यह दिन जेल जीवन में रेखांकित करने वाला दिन बनेगा। इलाहाबाद के नैनी सेंट्रल जेल में शनिवार को आन्तरिक मुलाक़ात होती है, यानी आज के दिन जेल के अंदर महिला बंदियों से उनके परिवार-रिश्तेदार के पुरुष बंदियों से मुलाक़ात करवायी जाती है। पति पत्नी होने के कारण मेरी और सीमा की मुलाक़ात 15 मिनट के लिए ही सही शनिवार के दिन तय रहती थी।

जेल दाखिले के बाद का यह पहला शनिवार था। मन तितली बन उड़ना चाहता था। दूर बहुत दूर या शायद जेल की ऊंची चारदिवारी के पार। रंग बिरंगी तितलियाँ सर्किल की दीवारें लांघ रही थी। दूसरी सर्किल में बेरोक -टोक आ जा रही थी। फूलों पर इठला रही थी, मंडरा रही थीं। फूल शरमा रहे थे, मुस्कुरा रहे थे और खिलखिला रहे थे। अफ़सोस कि यह आज़ादी हम बंदियों को नही थी। सर्किल से बाहर कोई नही जा सकता था, महिला सर्किल में तो कतई नही।

जेल दाखिले के बाद पहले शनिवार की मुलाक़ात का दिन था। हालांकि घर परिवार वालों की उपस्थिति में हम इस सप्ताह मिल चुके थे लेकिन एक सप्ताह के इस कठिन समय के बाद अलग से हम पहली बार मिल रहे थे। बहुत सारे भाव मन में उमड़ -घुमड़ रहे थे। सुबह से नहा-धोकर तैयार होकर मैं सर्किल में फूलों के इर्द – गिर्द मंडराने लगा। सर्किल नं 4 की बैरक नं 5 वाली लान में देसी गुलाब की लहलहाती, मुस्कुराती कलियाँ, फूल हवा में इठला रहे थे। मन को लुभा रहे थे। मन किया कि तोड़ लू दो फूल, और आज की मुलाक़ात में सीमा को दे दूं। लेकिन जेल में लाठी लिए लंबरदारों की नज़र से डर के मारे नही तोड़ सका। अभी मैं जेल में नया-नया था। जेल के क्रूर दंड विधान से डर भी लगता था।

एक दिन जेल में एक पुजारी ने गुलाब का फूल तोड़ लिया और ले जाकर शंकर की मूर्ति पर चढ़ा दिया। लम्बरदार ने उस बूढ़े बंदी को गन्दी -गन्दी गालियाँ दी और आगे से ऐसा न करने की हिदायत देकर छोड़ा। खैर… मैंने गुलाब का मोह छोड़ दिया और सर्किल आफिस की गोलाई में लगी गद्देदार चटक लाल रंग वाले “वेलवेट” फूलों वाली झाड़ियों पर मंडराने लगा। इन झाड़ियों पर लंबरदारों की निगाहें थोड़ी कम थी। मैंने लम्बरदार की नज़र बचाकर लाल रंग के दो  वेलवेट फूल तोड़ लिए। यही फूल आज की मुलाक़ात में सीमा को दिया था। सीमा ने भी उस दिन मुझे फूल दिया था,जो वो अपने बैरक से तोड़ कर लाई थी। अगले शनिवार की मुलाकात में मैंने सीमा को एक कार्ड भी बनाकर दिया था। जिस पर लिखा था- “लव इज एनर्जी ऑफ़ लाइफ”। 

धीरे-धीरे जेल की रीति-नीति से मैं वाक़िफ़ होने लगा था। मन से जेलर और लंबरदारों का डर ग़ायब होने लगा। फिर तो मैं अक्सर ही शनिवार को देसी गुलाब के दो फूल चुपके से तोड़ लेता था। 

जेल के दिन अंतहीन लगने लगे थे, रातें घुप्प अँधेरी जैसी। ऐसी कि दम घुटती सांसे चलती हो. ऐसे में जीवन के अन्य कई रंगों की दरकार थी. सीमा ने सुमन दीदी से कहकर वाटर कलर, ब्रश और कलर पेंसिल मंगा ली. जिसमें से कुछ मेरे हिस्से भी आयीं.

पढ़ने – लिखने के अलावा अब हम लोग कलर पेंसिल से कार्ड बनाने लगे. जेल में उपजे मनोभावों को कागज़ पर उकेरने लगे और उसमे रंग भरने लगे. सीमा ने ‘होसे मारिया सिसो’ की एक कविता का पोस्टर बनाया और अपनी बैरक की सीट के उपर लगा दिया-

दफ़्न कर देना चाहता है दुश्मन हमें

जेलखाने की अँधेरी गहराइयों में

लेकिन धरती के अँधेरे गर्भ से ही

दमकता सोना खोद निकाला जाता है

गोता मारकर बाहर लाया जाता है

झिलमिलाता मोती

सागर की अतल गहराइयों से

हम झेलते हैं यंत्रणा और अविचल रहते हैं

और निकालते हैं सोना और मोती

चरित्र की गहराइयों से

ढला है जो लम्बे संघर्ष के दौरान.

इसी कविता का पोस्टर सीमा ने मुझे भी बनाकर दिया।

मार्च का महीना कई यादगार तारीखों का महीना था। अपने राजनीतिक जीवन में 8 मार्च [महिला दिवस] और 23 मार्च [शहादत दिवस] तो संघर्षो के त्यौहार का दिन था। जुलूस सभाओं में शिरकत के बगैर जेल में कैदी मन अकुला रहा था।

मार्च के माह में ही होली का त्यौहार था। रंग – बिरंगी होली से याद आई अपनी शादी। वह माह भी मार्च का ही था, जेल में होली के कुछ दिन पहले या बाद आया। हम दोनों ने एक दूसरे को कागज़ पर कार्ड बनाकर दिया था। उपलब्ध रंग – रोगन से सजे कार्ड पर कुछ लाइनें लिखी थी।

तपती धरती पर

बारिश की बूंदों के गिरने से

निकलती सोंधी महक

तुम ही तो हो.

जवाबी प्यारे कार्ड में लिखा था:

अपनी अलग-अलग 

शख्सियत के साथ – बावजूद

हम एक डाल से

हमेशा जुड़े रहें

ताउम्र एक ही खाद – पानी

हमें पोषण देता रहे ।

मार्च बीत गया। अप्रैल का महीना आया। तपिश बढ़ती गयी। इंसानी शरीर से ठसाठस ठूँसी गयी बैरकों की गर्म हवा ही सांसों में आती -जाती सी लगती थी। ऐसे ही मौसम में अमलतास और गुलमोहर की याद आई थी। अदालत आते-जाते समय जमुना के नए पुल के नीचे गुलजार गुलमोहर-अमलतास के फूल गर्मी के गुरूर को चुनौती देते लगते। दो फूल पत्तियों के ऊपर चटक लाल रंग के सूरज बने कार्ड पर सीमा ने लिख भेजा-

जब सूरज अपने ताप से

तपा डालता है धरती को

तभी खिलता है उस पर

खूबसूरत

गुलमोहर अमलतास।

मैं भी कहाँ पीछे रहता. नए कपड़ों में लगी दफ्तियों को कार्ड बनाने के लिए सहेज कर रखने लगा था. उसी में से एक पर गुलमोहर-अमलतास के लाल-पीले फूलों से सजा एक कार्ड बनाया था, जिस पर लिखा था-

इस उदास मौसम में

चलो

हम भी खिल जाएँ

गुलमोहर – अमलतास बन जाए।

मौसम अपने नियम से बदलता रहा। मन भी कहाँ एक जैसा रह पाया। अदालत में मुकदमे की नूराकुश्ती भी एक जैसी कहाँ रह गयी थी। मुकदमे की विवेचना ‘एसटीएफ़’ से लेकर ‘एटीएस’ को सौप दी गयी थी। ऊपरी अदालतों से हमारी जमानत याचिका ख़ारिज की जाने लगी थी। ऐसे ही किसी समय में सीमा ने लहरों पर अखबार से फाड़े गये तैरती नाव वाले चित्र पर पेंसिल से लाल झंडे वाला कार्ड बनाकर दिया था। और उस कार्ड पर लिखा था-

जब

भंवर में

कश्ती उतारी है

तो

साथ

सिर्फ हौसले का हो।

न्यायालयों में काठ का हथौड़ा लगातार प्रहार कर रहा था। कलेंडर के पन्ने बदलने लगे थे। महीने दर महीने बीतने लगे थे। सचमुच साथ सिर्फ हौसले का था। सुप्रीम कोर्ट से सीमा की जमानत अर्जी ख़ारिज की जा चुकी थी। एक कागज़ पर पोस्टर बना मैने भी बैरक की उस दीवार पर लगा दिया था जहाँ मुझे सोने बैठने की जगह मिली थी। पोस्टर पर लिखा था-

बहुत ऊँची है 

तुम्हारी जेल की दीवारें

हमारी आवाज की बुलंदियों से

फिर भी कमतर हैं।

कौन कहता है

पस्त हो गए हौसले हमारे

अभी तो नांव मझधार में पड़ी है।

हम तो मांझी है

संभाल ली है पतवार अपनी

बस

हवा का रुख बदलने की

तनिक देर जो बाकी है।

बैरक की दीवार पर लगे इस पोस्टर को बंदी पढ़ते। कुछ बंदी इसका मतलब समझने की कोशिश करते। कुछ ने कहा  कि अच्छा लिखा है। एक दिन हमारे सर्किल के पाण्डेय जेलर भी आये थे बैरक में। तलाशी के दौरान उनकी निगाह पोस्टर पर पड़ी। उन्होंने पूछा ‘तुम लिखे हो?’ मेरे “हां” कहने पर वे मुस्कुराए और चल दिए।

धरती लगातार घूम रही थी। मौसम भी कहाँ ठहर पाता। गर्मी की तपिश पर बारिश की बूंदे गिर रही थी। धरती की कोख में पड़े पेड़-पौधों के बीज अंखुवाने को आतुर थे। जेल में हम दोनों के जन्म दिन का महीना आ धमका। जाड़े ने दस्तक दे दी थी। मन ना जाने क्यों इन तारीखों को कुछ ज्यादा ही शिद्दत से याद करने लगा था। सीमा के जन्म दिन पर फूल पत्तियों के साथ कागज़ पर कार्ड बनाया था। उस पर एक कविता लिखी थी-

उमग कर

जन्मों बार- बार

गर्मी के ताप को धता बताते हुए

अमलतास गुलमोहर के फूल बनकर।

तपते रेगिस्तान में

बारिश की ठंडी बूंदे बनकर।

मेहनतकश जनता के

दुश्मनों के खिलाफ़

बारूद बनकर।

तुम जन्मों

इस धरती पर

जाड़े की कड़कती ठंड में

सूरज की गुनगुनी धूप बनकर।

मेरे जन्म दिन पर सीमा ने खूबसूरत कार्ड के साथ कई छोटी – छोटी कवितायें मुबारक भरे तोहफे के बतौर दी थी। उनमें से एक थी-

अजब है

हमारा मन

सब तरफ

अँधेरा

फिर भी

उम्मीद का एक दीया

टिमटिमाता रहता है

अंदर।

जेल में हमारी पहली दिवाली थी। बैरकों के अंदर हम कैद थे। दीयों की रोशनी जेल की ऊँची दीवारों को लांघ जाने की उम्मीद में टिमटिमाये जा रही थी।

अपने बनाये कार्ड पर सीमा ने लिखा-

”निपट अँधेरे में भी हम

दीयों सा टिमटिमाते रहेंगे.”

चाँद तारों से सजे एक कार्ड में मैंने भी सीमा को ‘इरफ़ान सिद्दीकी’ की दो लाइनें लिख भेजी थी-

यही रहेगा तमाशा मेरे चिरागों का

हवा बुझाती रहेगी, जलाएं जाऊंगा मै।

2010 का दिसम्बर बीतने वाला था। नए साल की अगवानी में हम भी पीछे नही थे। पहाड़ों की बर्फीली चोटियाँ याद आने लगी थी। चीड़, देवदार के आसमान छूते पेड़ जीवन के खूबसूरत उबड़ – खाबड़ पगडंडियों की याद दिला रहे थे। नए साल की याद में कार्ड में पेंसिल से ऊंचे -ऊंचे पहाड़ बनाये थे. पहाड़ों के बीच टंगा लाल सूरज और आसमान को छू लेने को आतुर दो चीड़ के पेड़. उस पर लिखा था-

”हमारे तुम्हारे जीवन में टहक गुलजार बने 2011.”

सीमा ने धरती- सूरज बनाया था. कलरफुल पेंसिल से उसमें रंग भरा था। पेड़ की ओट से सूरज झांक रहा था. उस पर एक कविता लिखी थी-

धरती ने

सूरज का

एक चक्कर

पूरा किया

धरती अभी

सूरज की ओर

पीठ करके खड़ी है

कुछ ही देर बाद

वह मुंह घुमाकर

सूरज का चुम्बन लेगी

फिर

शर्म से लाल सूरज

नए साल के

आगमन की घोषणा कर देगा

नया साल मुबारक।

हम दोनों ने मिलकर कई कार्ड बनाये थे। मिलकर मतलब कि मैं अपनी बैरक में बैठकर कार्ड का रंग रोगन करके सीमा तक पहुँचा दिया करता था। सीमा ने उस पर चुन कर कविताएं लिखीं। कैद में रहते हुए जिन सगे-सम्बन्धियों तक पहुँचा सकते थे, पहुंचाया था। एक कार्ड पर चटक लाल रंग के फूल खिले थे, जिस पर  सीमा ने फैज़ की नज़्म लिख दी थी-

एक अन्य कार्ड पर लाल रंग का सूरज ख़्वाब सा खिल रहा था और उसके नीचे बने ऊँचे पहाड़ पर चटक रंग के फूल खिलखिला रहे थे जिस पर सीमा ने अहमद फ़राज़ की कविता लिख दी थी-

जेल जीवन के उदास, नीरस मन में ये कार्ड रंग भरते रहे। उस पर लिखी लाइनें हौसला देती रही. इस तरह उम्र कैद की सजा के बाद हाईकोर्ट से जमानत पर हम रिहा हुए, तब तक ढाई साल बीत चुके थे। ख़ास यह की हम दोनों हमसफर ने रिहाई का सफर भी साथ साथ ही पूरा किया।

शिव कुमार के साथ मेरा सफ़र: एक प्यारी मुस्कान के पीछे गंभीर कार्यकर्ता और पुलिस की ज्यादती | जसमिंदर टिन्कू

Editor’s Note: This piece was originally written in Hindi, find the English translation appended below.

आज से साढ़े पांच साल पहले मैं शिव कुमार के साथ जेल में रहा था। लगभग 16 दिन हम दोनों ने सोनीपत जेल में एक ही बैरक में बिताए। मैंने पहली बार देखा कि कैसे जाति की वजह से उसे सफाई के काम के लिए बार बार कहा जाता और हमने इस मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया। उस समय भी हमें झूठे केस में ही फंसाया गया था। हत्या का प्रयास, निजी संपत्ति में आगजनी, महिला शिक्षक की साड़ी फाड़ने जैसे संगीन आरोप हमारे ऊपर लगाए गए थे। कुल 40 महिला पुरुष गिरफ्तार किये गये थे, 26 महिलाएं और 14 पुरुष।

शिक्षा के अधिकार की धारा 134-A1 के तहत गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिले के लिए संघर्ष पूरे हरियाणा में चला हुआ था। सोनीपत में हम छात्र एकता मंच की तरफ से इस संघर्ष का हिस्सा थे। निजी स्कूलों की पढ़ाई के नाम पर मचाई जा रही लूट के खिलाफ चल रहा ये संघर्ष तीखा हो गया। अभिभावकों और छात्रों की एकता के आगे प्रशासन को झुकना पड़ा और गरीब बच्चों को कानून के अनुसार 15% और 20% मुफ्त दाखिले देने पड़े जिसकी वजह से सोनीपत के सारे प्राइवेट स्कूल की मंडियों के मालिकों ने एका कर लिया और साथ लिया कुछ तथाकथित राष्ट्रभक्त राजनेताओं को। जिन मंत्रियों को जनता का साथ देना चाहिए था उन्होंने लुटेरों के साथ मिलकर जनता के खिलाफ साजिश की और पुलिस के साथ गठजोड़ करके झूठे मुकदमों के तहत अभिभावकों और छात्रों को जेल में डाल दिया गया। लेकिन जनता की एकता और संघर्ष  की जीत हुई थी और हम सब जेल से बाहर आये थे। 

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जामिया और ए.एम.यू में पुलिस बर्बरता को एक साल | मधुर भारतीय

भारत की शैक्षिक संस्थाओं ने हमेशा से छात्र आंदोलनों को हतोत्साहित किया है। हालांकि यह अपने में ही शंका के योग्य है, इसका प्रभाव जो की छात्रों की समाज में छवि पर होता है, उसकी क्षति की सीमा उन् छात्र और उस शासन के क्रमशः धर्म और विचारधारा पर निर्भर है। जब नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 अधिनियमित हुआ, इससे हिंदुत्व BJP सरकार की मंशा स्पष्ट हो गयी। हर जगह इस कानून  के विरोध को कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने पूरी कोशिश करी रोकने की, और केवल उत्तर प्रदेश में ही २३ लोगों की मौत गोली लगने के कारण हुई। इस कोशिश का गंभीर रूप सामने आया जामिया मिलिया इस्लामिया (जामिया) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए.एम.यू) के छात्रों के प्रति। जामिआ और ए.एम.यू के छात्रों ने इसका विरोध किया तो उन्हे पुलिस बर्बरता का सामना करना पड़ा। इसके अतिरिक्त, दिल्ली में फ़रवरी २०२० में हुए दंगो से सम्बंधित गिरफ्तारियां भी इसी आंदोलन और ख़ास तौर से मुस्लिम छात्रों द्वारा संचालित आंदोलन से जुडी हुई हैं। इस सब में, छात्रों द्वारा  प्रदर्शन में छात्रों की भागीदारी पर  शैक्षिक संस्थानों का  विरोध और मीडिया और सरकार द्वारा छात्रों को  राष्ट्र विरोधी तत्वों के रूप में  देखा जाना नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

भारत में हम शैक्षिक स्थानों के भीतर संवैधानिक स्वतंत्रता पर अंकुश को बढ़ते देख रहे हैं। यह विशेष रूप से भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में है, जिसमें असहमति दर्शाने का अधिकार सम्मिलित है। 15 दिसंबर 2019 को जामिया और ए.एम.यू के परिसर कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा बल के क्रूर उपयोग के स्थल बन गए, जब विद्यार्थी सामूहिक रूप से नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 और दो दिन पूर्व हुई प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता का विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। गवाही और वीडियोग्राफी के रूप में अच्छी तरह से प्रलेखित साक्ष्य बताते हैं कि जब जामिया और ए.एम.यू के छात्र परिसरों के अंदर पीछे हट चुके थे उसके बाद भी पुलिस ने लंबे समय तक बल प्रयोग जारी रखा। 

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From Segregation to Labour, Manu’s Caste Law Governs the Indian Prison System | Sukanya Shantha

Editor’s Note: This article has been reposted with permission from the writer, Sukanya Shantha & The Wire, with illustrations by Pariplab Chakrabarty. It is also available in Hindi, Marathi, Urdu, Tamil, and Malayalam. This article, part of the series ‘Barred–The Prisons Project’, is produced in partnership with the Pulitzer Center on Crisis Reporting.

On his first day at the Alwar district prison, Ajay Kumar* was gearing up for the worst. Torture, stale food, biting cold and harsh labour – Bollywood had already acquainted him with the grisly realities of jails. “Gunah batao (Tell me your crime),” a police constable, placed at the undertrial (UT) section, asked him as soon as he was escorted inside a tall iron gateway.

Ajay had barely mumbled something, when the constable snapped, “Kaun jaati (Which caste)?” Unsure, Ajay paused and then hesitantly said, “Rajak”. The constable was not pleased with the response. He further inquired, “Biradari batao (Tell me the caste category). An inconsequential part of his life so far, Ajay’s caste identity, as part of a “Scheduled Caste”, was now to shape his 97-day stay in the prison.

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De-essentialising the Police | Kishor Govinda

On 24 March 2020, India entered into a nation-wide lockdown to contain the spread of the COVID19 pandemic. The Essential Services Maintenance Act (ESMA) was invoked to ensure proper state function at a critical time. The majority of the population had very little time to prepare, and initially, guidelines were applied arbitrarily. As a result, for the first week of the pandemic, India effectively became a police state. The police had to assume a range of functions in the foreground of the state’s response to a public health emergency.

The guidelines became clearer over the course of the lockdown, though stories of police violence and overstep were very common. Violence against people performing essential services, like medical care and provisioning, continued. Especially disturbing were stories of violence against marginal groups, such as the homeless, street vendors, and migrant workers who tried to travel back to their villages. 

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जेल: जहां सत्ता एकदम नंगी है | मनीष आज़ाद

तुम अकेले हो,

और कमरा भी बंद है,

कमरे में कोई आईना भी नहीं है,

अब तो अपना चेहरा उतार दो

बहुत पहले जावेद अख्तर के मुहं से ये पंक्तियाँ सुनी थी। जेल जाने के बाद ये पंक्तियाँ अक्सर मेरे दिमाग में गूंजती रहती थी। मजेदार बात ये है की जेल में सच में कोई आईना नहीं होता। पता नहीं ये पंक्तियाँ किस संदर्भ में लिखी गयी होंगी। लेकिन जेल के विशालकाय बंद दरवाजे के पीछे राज्य सत्ता यहाँ बिना किसी मुखौटे या आवरण के पूरा का पूरा मुझे नंगा नज़र आया। दरअसल यहाँ किसी आवरण की जरूरत भी नहीं है. क्योकि यहाँ किसी की निगरानी नहीं है।

सरकार या राज सत्ता द्वारा किये जाने वाले जिस भी अपराध को आप समाज में दबे छुपे रूप में देखते है, आपको उसका एकदम नंगा रूप यहाँ जेल में दिखाई देगा, चाहे वह भ्रष्टाचार हो या क्रूर दमन। कभी कभी लगता है की जेल बनाने का एक बड़ा कारण शायद ये रहा होगा की यहाँ सत्ता अपने स्वाभाविक यानि नंगे रूप में बिना किसी आवरण के थोडा आराम फरमा सके।  

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Short Releases, Long Sentences | Sahana Manjesh

Raju, a daily wage labourer was incarcerated at the age of 20 in the year 2000. He left behind two sisters and middle-aged parents. If Raju was to step out of prison for the first time now in 2020, the pandemic might be the last thing to bewilder him. In the time that he has been behind bars, his parents have passed away and he was not even able to attend their funerals. The house that belonged to his parents has since then been captured and sold off by encroachers. He was not around to contest the sale. His sisters have married in the meanwhile. His sisters’ husbands were not informed about his existence. In any case he no longer knows where they live. Raju worked on a handloom machine while in prison to earn some money, but those skills are not of much use in the real world. All his friends have grown up and moved to cities for work. 

How can he re-start his life outside prison? What real chance does he have at making a meaningful life?

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On Police and Power | Abhinav Sekhri

The use of force by police officers is a subject that continues to draw constant attention the world over and India is no exception. It is fair to state that police forces across the country have not been transformed post-independence from an autocratic force into a service for citizens. While very few of us question the predominant form of governance where the State has a monopoly on the use of force, police violence brings citizens face to face with the reality of what such a monopoly entails. The ambiguity in response — outrage at the deaths of some, celebration in the case of others — is perhaps only reflective of society’s own troubled relationship with the use of force.

Those musings aside, this short post takes up the issue of police violence from three specific viewpoints. First, I discuss why the abuse of powers by police officers matters and should matter. Second, I describe the excessive use of force as not an episodic problem which we witness only in cases of, say, custodial deaths and encounters, but as something that is deeply ingrained in every fibre of how the coercive state apparatus works in India. Third, I consider some ways in which this overarching coercive apparatus can be made slightly less overbearing each time a citizen enters the police station, in whatever capacity that might be.

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Colonialism(s) and the Global Politics of Dissent – Panel Discussion

We organised a panel as part of The World Transformed conference, held in the UK, with the help of Tanya Singh and Adrija Dey, that drew parallels between colonialism and the suppression of dissenting voices worldwide. Watch the discussion, read our live tweets and download the transcript below:

State surveillance, anti-terror laws and the rhetoric of ‘national security’ are being used to criminalise progressive activists and marginalised communities across the world. Speakers will discuss the colonial roots of policing and how histories of ‘anti-terrorism’ in the UK and ex-colonies, such as South Africa and India, continue to be linked before and after 9/11. We will also explore other colonialisms, such as China in Hong Kong. As states share and internationalise their repressive methods, we ask how we can build international coalitions of resistance.

Speakers: S’bu Zikode; Radha D’Souza; Gacheke Gachihi; Brian Hioe; Kerem Nişancıoğlu; Shalini Gera

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