post

जेल जीवन का एक रंग यह भी | विश्वविजय

फरवरी का महीना था। कड़ाके की ठण्ड धीरे -धीरे विदा हो रही थी। सूरज का तेज कोहरे के कोप पर भारी पड़ता जा रहा था। अब पूरे दिन कोहरे में नहीं ढका रहता था सूरज। सुबह के 9-10 बजते-बजते निकल ही आता था।

उस दिन भी सूरज निकल आया था। लेकिन ट्रेन कोहरे के कारण थोड़ी विलम्ब से चल रही थी। मैं सीमा को लेने स्टेशन पर गया था और वहीं से एसटीएफ़ की गिरफ़्त में आ गया। फिर माओवादी होने के आरोप में जेल चला गया। ख़ास यह कि मैं और सीमा साथ – साथ नैनी जेल इलाहाबाद में 7 फरवरी 2010 को कैद किये गए।

वैसे तो अपने जेल जीवन के अनुभवों को हम दोनों ने अपनी जेल डायरी ‘ज़िंदांनामा’ में बयां किया है। लेकिन जेल जीवन को दर्ज करते हुए कई पहलू हमसे छूट गए है, या यह कहें कि हमने छोड़ दिया।

हमनवां सीमा और मैं जेल के सफ़र में भी हमसफ़र रहे। साथ-साथ गिरफ्तार हुए और जेल गए। जिंदगी के सफ़र में गुज़रे इस मुक़ाम का एक पहलू यह रहा कि हम दोनों ने एक दूसरे को अपने मनोभावों से लबरेज अनेक चिट्ठियाँ लिखी। दुःख-सुख प्यार-मुहब्बत अफ़सोस कि उन चिठ्ठियों को हम सहेज नहीं पाए। तलाशी में छीन लिए जाने के डर से पढ़कर फाड़ते रहे। यदि उन चिठ्ठियों को हम सहेज पाते तो यक़ीनन एक मुकम्मिल किताब की शक्ल अख्तियार करती। फिर भी जेल की जालिम नज़र से हम कुछ कार्ड बचा लाये जो आज भी हमारे पास है। जिसके सहारे हम दोनों जेल के उदास मौसम में भी गुलमोहर-अमलतास की तरह टहक गुलजार बने रहे।

हमारी गिरफ्तारी का दिन शनिवार था। तब तक मुझे मालूम नहीं था, कि यह दिन जेल जीवन में रेखांकित करने वाला दिन बनेगा। इलाहाबाद के नैनी सेंट्रल जेल में शनिवार को आन्तरिक मुलाक़ात होती है, यानी आज के दिन जेल के अंदर महिला बंदियों से उनके परिवार-रिश्तेदार के पुरुष बंदियों से मुलाक़ात करवायी जाती है। पति पत्नी होने के कारण मेरी और सीमा की मुलाक़ात 15 मिनट के लिए ही सही शनिवार के दिन तय रहती थी।

जेल दाखिले के बाद का यह पहला शनिवार था। मन तितली बन उड़ना चाहता था। दूर बहुत दूर या शायद जेल की ऊंची चारदिवारी के पार। रंग बिरंगी तितलियाँ सर्किल की दीवारें लांघ रही थी। दूसरी सर्किल में बेरोक -टोक आ जा रही थी। फूलों पर इठला रही थी, मंडरा रही थीं। फूल शरमा रहे थे, मुस्कुरा रहे थे और खिलखिला रहे थे। अफ़सोस कि यह आज़ादी हम बंदियों को नही थी। सर्किल से बाहर कोई नही जा सकता था, महिला सर्किल में तो कतई नही।

जेल दाखिले के बाद पहले शनिवार की मुलाक़ात का दिन था। हालांकि घर परिवार वालों की उपस्थिति में हम इस सप्ताह मिल चुके थे लेकिन एक सप्ताह के इस कठिन समय के बाद अलग से हम पहली बार मिल रहे थे। बहुत सारे भाव मन में उमड़ -घुमड़ रहे थे। सुबह से नहा-धोकर तैयार होकर मैं सर्किल में फूलों के इर्द – गिर्द मंडराने लगा। सर्किल नं 4 की बैरक नं 5 वाली लान में देसी गुलाब की लहलहाती, मुस्कुराती कलियाँ, फूल हवा में इठला रहे थे। मन को लुभा रहे थे। मन किया कि तोड़ लू दो फूल, और आज की मुलाक़ात में सीमा को दे दूं। लेकिन जेल में लाठी लिए लंबरदारों की नज़र से डर के मारे नही तोड़ सका। अभी मैं जेल में नया-नया था। जेल के क्रूर दंड विधान से डर भी लगता था।

एक दिन जेल में एक पुजारी ने गुलाब का फूल तोड़ लिया और ले जाकर शंकर की मूर्ति पर चढ़ा दिया। लम्बरदार ने उस बूढ़े बंदी को गन्दी -गन्दी गालियाँ दी और आगे से ऐसा न करने की हिदायत देकर छोड़ा। खैर… मैंने गुलाब का मोह छोड़ दिया और सर्किल आफिस की गोलाई में लगी गद्देदार चटक लाल रंग वाले “वेलवेट” फूलों वाली झाड़ियों पर मंडराने लगा। इन झाड़ियों पर लंबरदारों की निगाहें थोड़ी कम थी। मैंने लम्बरदार की नज़र बचाकर लाल रंग के दो  वेलवेट फूल तोड़ लिए। यही फूल आज की मुलाक़ात में सीमा को दिया था। सीमा ने भी उस दिन मुझे फूल दिया था,जो वो अपने बैरक से तोड़ कर लाई थी। अगले शनिवार की मुलाकात में मैंने सीमा को एक कार्ड भी बनाकर दिया था। जिस पर लिखा था- “लव इज एनर्जी ऑफ़ लाइफ”। 

धीरे-धीरे जेल की रीति-नीति से मैं वाक़िफ़ होने लगा था। मन से जेलर और लंबरदारों का डर ग़ायब होने लगा। फिर तो मैं अक्सर ही शनिवार को देसी गुलाब के दो फूल चुपके से तोड़ लेता था। 

जेल के दिन अंतहीन लगने लगे थे, रातें घुप्प अँधेरी जैसी। ऐसी कि दम घुटती सांसे चलती हो. ऐसे में जीवन के अन्य कई रंगों की दरकार थी. सीमा ने सुमन दीदी से कहकर वाटर कलर, ब्रश और कलर पेंसिल मंगा ली. जिसमें से कुछ मेरे हिस्से भी आयीं.

पढ़ने – लिखने के अलावा अब हम लोग कलर पेंसिल से कार्ड बनाने लगे. जेल में उपजे मनोभावों को कागज़ पर उकेरने लगे और उसमे रंग भरने लगे. सीमा ने ‘होसे मारिया सिसो’ की एक कविता का पोस्टर बनाया और अपनी बैरक की सीट के उपर लगा दिया-

दफ़्न कर देना चाहता है दुश्मन हमें

जेलखाने की अँधेरी गहराइयों में

लेकिन धरती के अँधेरे गर्भ से ही

दमकता सोना खोद निकाला जाता है

गोता मारकर बाहर लाया जाता है

झिलमिलाता मोती

सागर की अतल गहराइयों से

हम झेलते हैं यंत्रणा और अविचल रहते हैं

और निकालते हैं सोना और मोती

चरित्र की गहराइयों से

ढला है जो लम्बे संघर्ष के दौरान.

इसी कविता का पोस्टर सीमा ने मुझे भी बनाकर दिया।

मार्च का महीना कई यादगार तारीखों का महीना था। अपने राजनीतिक जीवन में 8 मार्च [महिला दिवस] और 23 मार्च [शहादत दिवस] तो संघर्षो के त्यौहार का दिन था। जुलूस सभाओं में शिरकत के बगैर जेल में कैदी मन अकुला रहा था।

मार्च के माह में ही होली का त्यौहार था। रंग – बिरंगी होली से याद आई अपनी शादी। वह माह भी मार्च का ही था, जेल में होली के कुछ दिन पहले या बाद आया। हम दोनों ने एक दूसरे को कागज़ पर कार्ड बनाकर दिया था। उपलब्ध रंग – रोगन से सजे कार्ड पर कुछ लाइनें लिखी थी।

तपती धरती पर

बारिश की बूंदों के गिरने से

निकलती सोंधी महक

तुम ही तो हो.

जवाबी प्यारे कार्ड में लिखा था:

अपनी अलग-अलग 

शख्सियत के साथ – बावजूद

हम एक डाल से

हमेशा जुड़े रहें

ताउम्र एक ही खाद – पानी

हमें पोषण देता रहे ।

मार्च बीत गया। अप्रैल का महीना आया। तपिश बढ़ती गयी। इंसानी शरीर से ठसाठस ठूँसी गयी बैरकों की गर्म हवा ही सांसों में आती -जाती सी लगती थी। ऐसे ही मौसम में अमलतास और गुलमोहर की याद आई थी। अदालत आते-जाते समय जमुना के नए पुल के नीचे गुलजार गुलमोहर-अमलतास के फूल गर्मी के गुरूर को चुनौती देते लगते। दो फूल पत्तियों के ऊपर चटक लाल रंग के सूरज बने कार्ड पर सीमा ने लिख भेजा-

जब सूरज अपने ताप से

तपा डालता है धरती को

तभी खिलता है उस पर

खूबसूरत

गुलमोहर अमलतास।

मैं भी कहाँ पीछे रहता. नए कपड़ों में लगी दफ्तियों को कार्ड बनाने के लिए सहेज कर रखने लगा था. उसी में से एक पर गुलमोहर-अमलतास के लाल-पीले फूलों से सजा एक कार्ड बनाया था, जिस पर लिखा था-

इस उदास मौसम में

चलो

हम भी खिल जाएँ

गुलमोहर – अमलतास बन जाए।

मौसम अपने नियम से बदलता रहा। मन भी कहाँ एक जैसा रह पाया। अदालत में मुकदमे की नूराकुश्ती भी एक जैसी कहाँ रह गयी थी। मुकदमे की विवेचना ‘एसटीएफ़’ से लेकर ‘एटीएस’ को सौप दी गयी थी। ऊपरी अदालतों से हमारी जमानत याचिका ख़ारिज की जाने लगी थी। ऐसे ही किसी समय में सीमा ने लहरों पर अखबार से फाड़े गये तैरती नाव वाले चित्र पर पेंसिल से लाल झंडे वाला कार्ड बनाकर दिया था। और उस कार्ड पर लिखा था-

जब

भंवर में

कश्ती उतारी है

तो

साथ

सिर्फ हौसले का हो।

न्यायालयों में काठ का हथौड़ा लगातार प्रहार कर रहा था। कलेंडर के पन्ने बदलने लगे थे। महीने दर महीने बीतने लगे थे। सचमुच साथ सिर्फ हौसले का था। सुप्रीम कोर्ट से सीमा की जमानत अर्जी ख़ारिज की जा चुकी थी। एक कागज़ पर पोस्टर बना मैने भी बैरक की उस दीवार पर लगा दिया था जहाँ मुझे सोने बैठने की जगह मिली थी। पोस्टर पर लिखा था-

बहुत ऊँची है 

तुम्हारी जेल की दीवारें

हमारी आवाज की बुलंदियों से

फिर भी कमतर हैं।

कौन कहता है

पस्त हो गए हौसले हमारे

अभी तो नांव मझधार में पड़ी है।

हम तो मांझी है

संभाल ली है पतवार अपनी

बस

हवा का रुख बदलने की

तनिक देर जो बाकी है।

बैरक की दीवार पर लगे इस पोस्टर को बंदी पढ़ते। कुछ बंदी इसका मतलब समझने की कोशिश करते। कुछ ने कहा  कि अच्छा लिखा है। एक दिन हमारे सर्किल के पाण्डेय जेलर भी आये थे बैरक में। तलाशी के दौरान उनकी निगाह पोस्टर पर पड़ी। उन्होंने पूछा ‘तुम लिखे हो?’ मेरे “हां” कहने पर वे मुस्कुराए और चल दिए।

धरती लगातार घूम रही थी। मौसम भी कहाँ ठहर पाता। गर्मी की तपिश पर बारिश की बूंदे गिर रही थी। धरती की कोख में पड़े पेड़-पौधों के बीज अंखुवाने को आतुर थे। जेल में हम दोनों के जन्म दिन का महीना आ धमका। जाड़े ने दस्तक दे दी थी। मन ना जाने क्यों इन तारीखों को कुछ ज्यादा ही शिद्दत से याद करने लगा था। सीमा के जन्म दिन पर फूल पत्तियों के साथ कागज़ पर कार्ड बनाया था। उस पर एक कविता लिखी थी-

उमग कर

जन्मों बार- बार

गर्मी के ताप को धता बताते हुए

अमलतास गुलमोहर के फूल बनकर।

तपते रेगिस्तान में

बारिश की ठंडी बूंदे बनकर।

मेहनतकश जनता के

दुश्मनों के खिलाफ़

बारूद बनकर।

तुम जन्मों

इस धरती पर

जाड़े की कड़कती ठंड में

सूरज की गुनगुनी धूप बनकर।

मेरे जन्म दिन पर सीमा ने खूबसूरत कार्ड के साथ कई छोटी – छोटी कवितायें मुबारक भरे तोहफे के बतौर दी थी। उनमें से एक थी-

अजब है

हमारा मन

सब तरफ

अँधेरा

फिर भी

उम्मीद का एक दीया

टिमटिमाता रहता है

अंदर।

जेल में हमारी पहली दिवाली थी। बैरकों के अंदर हम कैद थे। दीयों की रोशनी जेल की ऊँची दीवारों को लांघ जाने की उम्मीद में टिमटिमाये जा रही थी।

अपने बनाये कार्ड पर सीमा ने लिखा-

”निपट अँधेरे में भी हम

दीयों सा टिमटिमाते रहेंगे.”

चाँद तारों से सजे एक कार्ड में मैंने भी सीमा को ‘इरफ़ान सिद्दीकी’ की दो लाइनें लिख भेजी थी-

यही रहेगा तमाशा मेरे चिरागों का

हवा बुझाती रहेगी, जलाएं जाऊंगा मै।

2010 का दिसम्बर बीतने वाला था। नए साल की अगवानी में हम भी पीछे नही थे। पहाड़ों की बर्फीली चोटियाँ याद आने लगी थी। चीड़, देवदार के आसमान छूते पेड़ जीवन के खूबसूरत उबड़ – खाबड़ पगडंडियों की याद दिला रहे थे। नए साल की याद में कार्ड में पेंसिल से ऊंचे -ऊंचे पहाड़ बनाये थे. पहाड़ों के बीच टंगा लाल सूरज और आसमान को छू लेने को आतुर दो चीड़ के पेड़. उस पर लिखा था-

”हमारे तुम्हारे जीवन में टहक गुलजार बने 2011.”

सीमा ने धरती- सूरज बनाया था. कलरफुल पेंसिल से उसमें रंग भरा था। पेड़ की ओट से सूरज झांक रहा था. उस पर एक कविता लिखी थी-

धरती ने

सूरज का

एक चक्कर

पूरा किया

धरती अभी

सूरज की ओर

पीठ करके खड़ी है

कुछ ही देर बाद

वह मुंह घुमाकर

सूरज का चुम्बन लेगी

फिर

शर्म से लाल सूरज

नए साल के

आगमन की घोषणा कर देगा

नया साल मुबारक।

हम दोनों ने मिलकर कई कार्ड बनाये थे। मिलकर मतलब कि मैं अपनी बैरक में बैठकर कार्ड का रंग रोगन करके सीमा तक पहुँचा दिया करता था। सीमा ने उस पर चुन कर कविताएं लिखीं। कैद में रहते हुए जिन सगे-सम्बन्धियों तक पहुँचा सकते थे, पहुंचाया था। एक कार्ड पर चटक लाल रंग के फूल खिले थे, जिस पर  सीमा ने फैज़ की नज़्म लिख दी थी-

एक अन्य कार्ड पर लाल रंग का सूरज ख़्वाब सा खिल रहा था और उसके नीचे बने ऊँचे पहाड़ पर चटक रंग के फूल खिलखिला रहे थे जिस पर सीमा ने अहमद फ़राज़ की कविता लिख दी थी-

जेल जीवन के उदास, नीरस मन में ये कार्ड रंग भरते रहे। उस पर लिखी लाइनें हौसला देती रही. इस तरह उम्र कैद की सजा के बाद हाईकोर्ट से जमानत पर हम रिहा हुए, तब तक ढाई साल बीत चुके थे। ख़ास यह की हम दोनों हमसफर ने रिहाई का सफर भी साथ साथ ही पूरा किया।